Monday, September 21, 2015

तुलसी (Tulsi or Basil) - medicinal use

तुलसी (Tulsi or Basil)
प्राचीन काल से भारतवर्ष में तुलसी को भगवान स्वरूप पूजा जाता रहा है. धरती पर एक वरदान स्वरूप है तुलसी. मंदिरों में आज भी तुलसी-चरणामृत प्रत्येक दर्शनार्थी को दिया जाता है और और मान्यताओं के अनुसार हर घर में तुलसी (Basil) का पौधा लगाना जरुरी बतलाया गया है,   इसके पीछे धार्मिक मह्त्ता के साथ साथ वैज्ञानिक कारण भी है.
तुलसी को दवाई के रूप में भी बहुतायत से उपयोग किया जाता है. कुछ प्रयोग निम्नलिखित है :-
·                       तुलसी में Anti-Bacterial तत्व पाए जाते है. यदि सुबह, दोपहर और संध्या में तुलसी के एक पत्ता ही निगला जाये  तो यह शरीर की शुद्धि कर रोगों से मुक्त कर देती है.
·                       नित्य तुलसी के 3-5 पत्ते खाने से Fever और सर्दी नहीं होती.
·                       Tulsi से मुंह की दुर्गन्ध pyorrhea दूर होती है.
·                       इससे Cholesterol कंट्रोल रहता है.
·                       त्वचा संबधी रोग जैसे दाद, खुजली आदि पर इसका अर्क फायदा पहुचाता है.
·                       Tulsi का सेवन Diabetes से बचाता है.
·                       तुलसी पेट के रोग जैसे अलसर को मिटाता है.
·                       वैज्ञानिक की शोध के अनुसार Basil कीटाणुओं को नष्ट करती है
·                       सर्दी, खांसी और बुखार दवा रूप में लेने से लाभ मिलता है.
·                       वजन घटाने या मोटापे को रोकने  में सहायक होती है.
·                       देशी इलाज मे Tulsi और गिलोय से Swine Flu का treatment किया जाता है.
·                       इससे शरीर की पथरी की दवा बनाई जाती है.

Note:
·                       तुलसी को चबाना वर्जित है, तुलसी चबाने से दांतों को हानि पहुंचती है.
·                       गर्भवती स्त्री को Tulsi का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए
* हमारे शास्त्रों में तुलसी तोड़ने निषेध समय बताएं गए है जो की इस प्रकार है :-
 रविवार, मंगलवार और शुक्रवार
 द्वादशी, अमावस्या एवम् पूर्णिमा
 संध्या काल में और रात्री में
 बिना नहाये और जूता-चप्पल पहनकर भी तुलसी को छुएं

निषेध काल में भी तुसली पौधे से स्वतः टूटी हुई पत्तियों का प्रयोग किया सकता है

Friday, September 11, 2015

शरीर के संकेतों को समझें

शरीर में झनझनाहट होती है? नींद नहीं आती, त्वचा रूखी और एड़ी में क्रैक्स बने रहते हैं? अगर हां, तो ये और ऐसी ही कई अन्य बातें संकेत देती हैं कि आपके भोजन में मिनरल और विटामिन्स की कमी है। शरीर की सुनें और खान-पान में सुधार करें। 

कब्ज
मैग्नीशियम  से इम्युनिटी बढ़ती है और  हृदय स्वस्थ रहता है।  मांसपेशियों को स्वस्थ रखने में भी इसकी  उपयोगी भूमिका होती है। इसकी कमी  से कब्ज होता है, क्योंकि मैग्नीशियम आंतों के रास्ते में पानी रोक कर मल को मुलायम बनाए रखता है। आंतों को आराम मिलता है और भोजन को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में मदद मिलती है। ये खाएं: हरी पत्तेदार सब्जियां, सीताफल के बीज व सोयाबीन। 
मसूड़ों से खून आना
कोलेजन के निर्माण में विटामिन सी की अहम भूमिका होती है। यह ऐसा प्रोटीन है, जो त्वचा को मुलायम बनाता है और त्वचा के कसाव को बरकरार रखता है। त्वचा की कोशिकाओं को दोबारा जीवित करता है। इस विटामिन की कमी से शरीर के टिश्यू तेजी से क्षतिग्रस्त होते हैं। इसी कारण ब्रश करते हुए मसूड़ों से खून आने लगता है। विटामिन सी की कमी के अलावा धूम्रपान, एल्कोहल, स्टेरॉइड और एंटीडिप्रेसेंट दवाएं अधिक लेना मसूड़ों में खून निकलने का कारण होते हैं।

क्या करें: धूम्रपान और एल्कोहल का सेवन कम से कम करें। डाइट में अमरूद, संतरा और आंवला शामिल करें।

एड़ी फटना
त्वचा में मॉइस्चर की कमी के कारण ही एड़ी फटने लगती है। शरीर में विटामिन बी-3 की कमी के कारण भी ऐसा होता है, जिसे पेलाग्रा  कहते हैं, जिससे त्वचा रूखी-सूखी और दरदरी हो जाती है तथा एड़ी में दरार पड़ती है। 

ये खाएं: मूंगफली में विटामिन बी 3 पर्याप्त मात्रा में होता है। इसके अलावा ब्राउन राइस और हरी पत्तेदार सब्जियों को भी डाइट में शामिल करें।

नींद की अनियमितता
विटामिन डी की कमी से सिर्फ हड्डियों का भुरभुराना और डिप्रेशन नहीं होता।  शोध के अनुसार इससे नींद की कमी, यहां तक कि इंसोमिया होने की आशंका भी बढ़ जाती है। पर्याप्त विटामिन डी लेना हमारी नींद के चक्र को सामान्य बनाए रखता है। शरीर में नींद लाने में सहयोगी हार्मोन मेलाटोनिन का स्राव बढ़ता है।

क्या खाएं: सूरज की धूप में समय बिताएं। यदि संभव हो तो सुबह 8 से 10 बजे के बीच करीब आधा घंटा धूप में बिताएं। यदि शरीर में विटामिन डी की अधिक कमी है तो सप्लिमेंट्स लेना बेहतर रहता है। फोर्टिफाइड फूड जैसे दूध और अनाज को डाइट में शामिल करें।

मांसपेशी खिंचना
मांसपेशियों में थकावट या खिंचाव, बहुत अधिक व्यायाम करने या रक्त संचार दुरुस्त न होने पर होते हैं। यदि नस चढ़ने की समस्या अधिक है तो यह विटामिन बी की कमी से भी हो सकता है।
क्या खाएं: सालमन, टूना, केला, आलू छिलके के साथ), सूरजमुखी के बीज, ब्रोकली, मेवे व मक्का खाएं। 

मुंह के  किनारों का फटना
विटामिन बी-2 की कमी से ऐसा होता है। इसके कारण मुंह में छाले व  होठों के किनारों पर घाव हो जाते हैं। कुछ लोगों को जीभ पर जलन भी महसूस होती है।
क्या खाएं: बादाम, मशरूम और पालक में पर्याप्त मात्रा मंे विटामिन्स होते हैं।

पतले व रेखादार नाखून
खून की कमी के अलावा शरीर में आयरन की कमी से नाखून पतले, धारीदार और टेढ़-मेढ़े हो जाते हैं। आयरन की कमी से हीमोग्लोबिन का स्तर कम होता है, जो शरीर में ऑक्सीजन के प्रवाह पर असर डालता है। यदि शरीर में ऑक्सीजन का स्तर कम है तो इससे बालों और नाखूनों की सेहत पर असर पड़ता है।
क्या खाएं: अनार, अंडे की जर्दी, खट्टे फल जैसे संतरा, मौसमी, नींबू, आंवला आदि।

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गठिया क्यों बढ़ रहा है?

एम्स के डिपार्टमेंट ऑफ रूमैटॉलजी में विभागाध्यक्ष प्रोफेसर उमा कुमार -

देश में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां मधुमेह, रक्तचाप, दिल के रोग आदि बढ़ रहे हैं, लेकिन एक और बीमारी है, जो तेजी से अपने पैर पसार रही है। खेद की बात यह है कि इसकी ओर नीति-निर्माताओं का ध्यान भी कम है। यह रोग है मांसपेशियों एवं जोड़ों में दर्द से जुड़ा गठिया या आर्थ्राइटिस।

इसमें मांसपेशियों एवं जोड़ों में दर्द, सूजन, लालिमा पैदा होती है। इसके रोगी को उठने-बैठने, चलने-फिरने, झुकने या किसी खास किस्म का कार्य करने में तकलीफ होती है। इसे रूमैटिज्म या गठिया कहते हैं। गठिया की बीमारी करीब दो सौ किस्म की होती है। कई बार कई किस्म के बुखार या कभी-कभी मांसपेशियों के दबने या उन पर दबाव पड़ने की वजह से भी मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द होता है। मोटे तौर पर यदि सुबह उठने के बाद आधे घंटे के भीतर शरीर की जकड़न दूर नहीं हो रही है तो यह गठिया के लक्षण हो सकते हैं।

गठिया क्यों बढ़ रहा है?
इसके लिए पर्यावरण से जुड़े कारण सबसे ज्यादा जिम्मेदार होते हैं। अध्ययन बताते हैं कि जहां प्रदूषण की समस्या ज्यादा गंभीर है, वहां गठिया ज्यादा हो रहा है। आर्थ्राइटिस आंतों में संक्रमण की वजह से भी होता है, जिसकी वजह दूषित खान-पान हो सकता है।

नए अध्ययन संकेत दे रहे हैं कि जीवनशैली भी इस बीमारी को बढ़ा रही है। ज्यादा खाने-पीने के कारण मोटापे की चपेट में आने, एक स्थिति में ज्यादा देर तक बैठे रहने, कंप्यूटर पर लंबे समय तक कार्य करने, कंधे व गर्दन के बीच मोबाइल दबा कर लंबे समय तक बात करने जैसी स्थितियों से भी मांसपेशियों एवं जोड़ों का दर्द होता है। हालांकि यह गठिया नहीं है, लेकिन इसके प्रभाव गठिया जैसे ही महसूस होते हैं। दूसरे ज्यादा उम्र वालों में ही नहीं, बच्चों व जवानों में भी गठिया हो रहा है।

प्रदूषण बड़ा कारक
गठिया को लेकर हमने एम्स की ओपीडी में आने वाले 300 मरीजों के आंकड़े जुटाए हैं। आरंभिक जांच में यह पाया गया कि जब दिल्ली में पीएम-2.5 की मात्रा हवा में ज्यादा पाई गई, तब गठिया के रोगी ज्यादा सामने आए। ऐसे मरीजों के आंकड़े एकत्र किए गए, जिससे यह बात सामने आती है कि जब हवा में पीएम-2.5 ज्यादा मात्रा में घुल जाते हैं तो यह सांस लेने के साथ शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। रक्त के साथ ये शरीर के सभी अंगों में पहुंचते हैं। इसी प्रक्रिया में पीएम-2.5 की मात्रा जोड़ों के ईद-गिर्द कोशिकाओं में रक्त एवं ऑक्सीजन के प्रवाह को बाधित करती है।

सही जांच जरूरी
मांसपेशियों एवं जोड़ों में दर्द की शिकायत आज आम बात हो गई है। शहरों में यह स्थिति ज्यादा गंभीर है, जहां शारीरिक गतिविधियां लोगों में कम हैं। इसलिए सही जांच जरूरी है। इसके लिए हड्डी रोग विशेषज्ञ की बजाय गठिया रोग विशेषज्ञ के पास जाएं। दूसरे बिना जांच के गठिया या आर्थ्राइटिस की दवा का सेवन नहीं करना चाहिए। इससे दवाओं के दुष्प्रभाव हो सकते हैं। स्टेरॉइड वाली दवाओं का तो सेवन कतई नहीं किया जाना चाहिए।

जरूरी है सही जांच
बीमारी का गलत इलाज ज्यादा घातक हो सकता है। हाल में एक व्यक्ति पीठ की दर्द की शिकायत के साथ पहुंचे। उन्हें डॉक्टर ने स्लिप डिस्क बता कर ऑपरेशन की सलाह दे दी थी। वह सेकेंड ओपिनियन के लिए आए थे। जांच के बाद पाया कि यह स्लिप डिस्क का मामला नहीं था और न ही गठिया का। उन्हें सिर्फ पीठ दर्द की शिकायत थी। वह हवाई यात्राएं  व कंप्यूटर कार्य ज्यादा कर रहे थे, जिससे एक स्थिति में बैठने के कारण यह बीमारी हुई। हमने उन्हें कुछ व्यायाम बताए एवं हवाई जहाज में बैठते समय सावधानियां बरतने को कहा। छह-सात महीनों में जब वे दोबारा आए तो समस्या खत्म हो गई थी।

दूसरा, एक 23 वर्षीय महिला हाथों में आर्थ्राइटिस की समस्या लेकर आईं। वह आर्थ्राइटिस की दवा ले रही थीं। लेकिन हमने जब रिपोर्ट देखी तो उन्हें आर्थ्राइटिस नहीं था, बल्कि लिवर में कुछ समस्या थी, पर आर्थ्राइटिस की दवा देने के बाद उन्हें पीलिया ने पकड़ लिया था। एक अन्य मामले में एक 63 वर्षीया महिला नसों में सूजन के आर्थ्राइटिस से पीडि़त थीं, जिससे
उनके मुंह से खून आ रहा था, पर डॉक्टर टीबी की दवा दे रहे थे।

सिर्फ जांच ही काफी नहीं
यह देखा गया है कि अकसर लोग ईएसआर, सीआरपी जैसे टैस्ट पॉजिटिव निकलने पर उसे गठिया मान लेते हैं। यह सही नहीं है। यह शरीर में सिर्फ सूजन व संक्रमण  दर्शाते हैं। यह हमेशा गठिया का पैमाना नहीं होता। इसी प्रकार रूमैटाइड फैक्टर (आरएफ) एंटी न्यूक्लियर एंटीबॉडीज (एएनए) के पॉजिटिव निकलने का मतलब भी गठिया संक्रमण जरूरी नहीं है। पांच फीसदी स्वस्थ लोगों में भी यह टैस्ट पॉजिटिव निकलते हैं। 

इलाज की सुविधाओं की कमी
देश में 7 से 18 फीसदी आबादी के गठिया या मांसपेशियों से जुड़ी बीमारियों से ग्रस्त होने का अनुमान है, लेकिन इलाज की सुविधाएं बेहद कम हैं। रूमैटॉलॉजिस्ट की देश में सिर्फ 15 पोस्ट ग्रेजुएट सीटें हैं। देश में आधा दर्जन अस्पतालों में ही रूमैटॉलजी विभाग है। इसे गैर संचारी रोगों की श्रेणी में भी नहीं रखा गया है, इसलिए सरकारी नीतियों में इस बीमारी पर खास जोर नहीं है। 

कुछ तथ्य
' यह नवजात शिशुओं से लेकर वृद्धों में पाया जाता है। मां से बच्चे में भी आ सकता है।
' स्त्रियां अधिक शिकार हैं। ताजा शोध बताते हैं कि युवाओं में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं।
' ऑस्टियोआर्थ्राइटिस सबसे अधिक पाया जाने वाला गठिया है। गठिया होने पर रूमैटॉलॉजिस्ट से सलाह लें, हड्डी रोग विशेषज्ञ से नहीं। यह दवा से ठीक होने वाली बीमारी है, शल्य क्रिया से नहीं।
' दुनिया में प्रतिवर्ष आर्थ्राइटिस से सौ अरब डॉलर की क्षति होती है। करीब दस लाख लोग अस्पताल में भर्ती होते हैं और पांच करोड़ लोग ओपीडी में जाते हैं।

Saabhar: www.livehindustan.com

Friday, March 21, 2014

Jaundice: Symptoms, Prevention and Treatments with Ayurvedic Approach- Gadahpurna plant's root

Jaundice: Symptoms, Prevention and Treatments with Ayurvedic Approach

Jaundice, also known as Icterus, is a term used to describe a yellowish tinge to the skin and sclerae (the white part of the eye) that is caused by hyperbilirubinemia (an excess of bilirubin in the blood). Body fluids may also be yellow. The color of the skin and sclerae varies depending on levels of bilirubin; mildly elevated levels display yellow skin and sclerae, while highly elevated levels display brown. 

Bilirubin (bil-ih-ROO-bin) is a yellow colored substance that is responsible for the yellowing of the skin and sclerae. Bilirubin is a waste product that remains in the bloodstream after the iron is removed from the hemoglobin, which is released from the degradation of erythrocytes (cells that contain hemoglobin and can carry oxygen to the body). When there is an excess of bilirubin it may leak out into surrounding tissues, saturating them with this yellow substance. 

Bilirubin that is circulating freely in the blood is called unconjugated bilirubin. One of the liver's functions is to filter out waste, such as bilirubin, from the blood. Once it is in the liver, other chemicals latch on to the bilirubin, creating a substance called conjugated bilirubin, which is secreted in bile (a digestive juice released by the liver) and then excreted. Bilirubin is what gives feces its brown color. 

The modern English word "jaundice" is derived from the middle French word jaunisse. Jaun means "yellow" and -isse means "-ness"; hence the middle French word jaunisse, which means "yellowness". 

According to MediLexicon's 
medical dictionary, jaundice is:
"A yellowish staining of the integument, sclerae, deeper tissues, and excretions with bile pigments, resulting from increased levels in the plasma."

Three main types of jaundice -

§                        Hepatocellular jaundice - a type of jaundice that occurs as a result of liver disease or injury.
§                        Hemolytic jaundice - a type of jaundice that occurs as a result of hemolysis (an accelerated breakdown of erythrocytes - red blood cells) leading to an increase in production of bilirubin.
§                        Obstructive jaundice - a type of jaundice that occurs as a result of an obstruction in the bile duct (a system of tubes that carries bile from the liver to the gallbladder and small intestine), which prevents bilirubin from leaving the liver.
Jaundice, not to be confused with infant jaundice, is usually a sign of an underlying disorder.

Symptoms of jaundice -

The most pervasive sign of jaundice is a yellow tinge to the skin and sclerae (whites of the eyes). This usually starts at the head and spreads down the body. 

Other symptoms of jaundice include:
§                        Pruritis (itchiness)
§                        Fatigue
§                        Abdominal pain - typically indicates a blockage of the bile duct.
§                        Weight loss
§                        Vomiting
§                        Fever
§                        Paler than usual stools
§                        Dark urine

 

How can jaundice be prevented?

Prevention depends on the disorder causing jaundice. You may not be able to prevent some of the disorders. However, you can take the steps below to decrease your chance of developing liver disease:
·                                Limit your alcohol intake to no more than two drinks a day for men or one drink a day for women.
·                                Be careful in mixing drugs, especially alcohol, with over-the-counter and prescription medicines.
·                                Avoid exposure to industrial chemicals.
·                                Do not use illegal drugs.
·                                Do not share needles or nasal snorting equipment.
·                                Practice safe sex.
·                                To decrease your risk of hepatitis A, get the hepatitis A vaccine.
·                                To decrease your risk of hepatitis B, get the hepatitis B vaccine.

Jaundice is related to the function of the liver, so it is essential that you maintain this vital organ's health by eating a balanced diet, exercising at least 30 minutes five times a week, and refraining from exceeding recommended amounts of alcohol. 

 

Treatment options for jaundice with Ayurvedic Approach-

Treatment of jaundice typically requires a diagnosis of the specific cause in order to select suitable treatment options. Treatment would target the specific cause, rather than the jaundice itself. 

Anemia-induced jaundice may be treated by increasing the amount of iron in the blood; either by taking iron-supplements or eating more iron-rich foods. 

Hepatitis-induced jaundice may be treated with anti-viral or steroid medications. 

Obstruction-induced jaundice may be treated via surgery to remove the obstruction. 

Medication-induced jaundice is treated by selecting an alternative medication and by discontinuing medications that caused jaundice.

 

Ayurvedic Treatment –

There may be several herbal plants like Amla, Ghritkumari, Karaila, Lauki, etc. useful for jaundice, but here I am to tell about a specific root of plant that is generally called “Gadahpurna” in Hindi. If you find the root of Gadapurna, you have to grind it and mix it with water and make a glass of drink atleast two times in a day. I think…It has a guarantee for removal of jaundice.

 


 ...With Thanks to various websites for information only.

Saturday, July 24, 2010

एड्स का इलाज अब सम्भव


दुनिया भर में तेजी से पांव पसारते जा रहे एड्स का इलाज अब सम्भव हैं। इस स्थिति की भयावहता का ही यह परिणाम है कि एचआईवी पॉजिटिव होने का मतलब आमतौर पर जिंदगी का अंत मान लिया जाता है, लेकिन यह अधूरा सच है। अगर डॉक्टरों की सलाह के मुताबिक चला जाए तो एचआईवी पॉजिटिव लोग भी लंबे समय तक सामान्य जीवन जी सकते हैं।

क्या है एचआईवी और एड्स ?

एचआईवी (ह्यूमन इम्यूनोडिफिशिएंसी वायरस) एक ऐसा वायरस है, जिसकी वजह से एड्स होता है। यह वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलता है। जिस इंसान में इस वायरस की मौजूदगी होती है, उसे हम एचआईवी पॉजिटिव कहते हैं। आमतौर पर लोग एचआईवी पॉजिटिव होने का मतलब ही एड्स समझने लगते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है।

दरअसल, होता यह है कि एचआईवी के शरीर में प्रवेश कर जाने के बाद शरीर की प्रतिरोधक क्षमता (बीमारियों से लड़ने की क्षमता) धीरे-धीरे कम होने लगती है। प्रतिरोधक क्षमता कम होने से शरीर पर तमाम तरह की बीमारियां और इन्फेक्शन पैदा करने वाले वायरस आदि अटैक करने लगते हैं। एचआईवी पॉजिटिव होने के करीब 8 से 10 साल बाद इन तमाम बीमारियों के लक्षण दिखने शुरू हो जाते हैं। इस स्थिति को ही एड्स कहा जाता है। वैसे, एचआईवी पॉजिटिव होने के बाद से एड्स होने तक के वक्त को दवाओं की मदद से बढ़ाया जा सकता है और कुछ बीमारियों को ठीक भी किया जा सकता है। जाहिर है, एचआईवी पॉजिटिव होना या एड्स अपने आप में कोई बीमारी नहीं हैं, बल्कि इसकी वजह से बीमारियों से लड़ने की शरीर की क्षमता कम हो जाती है और तमाम बीमारियां अटैक कर देती हैं।

कैसे काम करता है एड्स का वायरस -

वायरस (एचआईवी) की वजह से एड्स होता है। यह वायरस शरीर की जीवित कोशिका (लिविंग सेल) के अंदर रहता है। शरीर से बाहर यह आधे घंटे से ज्यादा रह नहीं सकता। यानी खुले में इस वायरस के जीवित रहने, पनपने या फैलने की कोई आशंका नहीं है।

एचआईवी दो तरह का होता है -

एचआईवी-1 और एचआईवी-2

एचआईवी-1 पूरी दुनिया में पाया जाता है और भारत में भी 80 फीसदी मामले इसी के हैं। एचआईवी-2 खासतौर से अफ्रीका में मिलता है। भारत में भी कुछ लोगों में इसका इन्फेक्शन देखा गया है। कुछ लोगों को दोनों वायरस की वजह से इन्फेक्शन होता है। वैसे, एचआईवी-2 इन्फेक्शन वाले लोग एचआईवी-1 वालों से ज्यादा जीते हैं। मां से बच्चे में एचआईवी-2 ट्रांसफर होने के चांस न के बराबर होते हैं।

शरीर में घुसने के बाद यह वायरस वाइट ब्लड सेल्स पर अटैक करता है और धीरे-धीरे उन्हें मारता रहता है।

इन सेल्स के खत्म होने के बाद इन्फेक्शन और बीमारियों से लड़ने की हमारे शरीर की क्षमता कम होने लगती है। नतीजा यह होता है कि आए दिन शरीर में तमाम तरह के इन्फेक्शन होने लगते हैं। एचआईवी इन्फेक्शन की यह लास्ट स्टेज है और इसी स्टेज को एड्स कहा जाता है।

ऐसे फैल सकता है -


  • एचआईवी पॉजिटिव पुरुष या महिला के साथ अनसेफ (कॉन्डम यूज किए बिना) सेक्स से, चाहे सेक्स होमोसेक्सुअल ही क्यों न हो।
  • संक्रमित (इन्फेक्टेड) खून चढ़ाने से।
  • एचआईवी पॉजिटिव महिला से पैदा हुए बच्चे में। बच्चा होने के बाद एचआईवी ग्रस्त मां के दूध पिलाने से भी इन्फेक्शन फैल सकता है।
  • खून का सैंपल लेने या खून चढ़ाने में डिस्पोजेबल सिरिंज (सिर्फ एक ही बार इस्तेमाल में आने वाली सुई) न यूज करने से या फिर स्टर्लाइज किए बिना निडल और सिरिंज का यूज करने से।
  • हेयर ड्रेसर (नाई) के यहां बिना स्टर्लाइज्ड (रोगाणु-मुक्त) उस्तरा, पुराना इन्फेक्टेड ब्लेड यूज करने से।
  • सलून में इन्फेक्टेड व्यक्ति की शेव में यूज किए ब्लेड से। सलून में हमेशा नया ब्लेड यूज हो रहा है, यह इंशुअर करें।

ऐसे नहीं फैलता -


  • चूमने से। लेकिन अगर किसी व्यक्ति को एड्स है और उसके मुंह में कट या मसूड़े में सूजन जैसी समस्या है, तो इस तरह के व्यक्ति को चूमने से भी एड्स फैल सकता है। यानी एड्स का संक्रमण चूमने पर भी फैल सकता है, अगर सावधानी न बरती जाए।
  • हाथ मिलाना, गले मिलना, एक ही टॉयलेट को यूज करना, एक ही गिलास में पानी पीना, छीकने, खांसने से इन्फेक्शन नहीं फैलता।
  • एचआईवी शरीर के बाहर ज्यादा देर तक नहीं रह सकता, इसलिए यह खाने और हवा से भी नहीं फैलता।
  • रक्तदान करने से बशर्ते खून निकालने में डिस्पोजेबल (इस्तेमाल के बाद फेंक दी जाने वाली) सुई का इस्तेमाल किया गया हो।
  • मच्छर काटने से।
  • टैटू बनवाने से, बशर्ते इस्तेमाल किए जा रहे औजार स्टर्लाइज्ड हों।
  • डॉक्टर या डेंटिस्ट के पास इलाज कराने से। ये लोग भी आमतौर पर स्टरलाइज्ड औजारों का ही इस्तेमाल करते हैं।

इनके जरिए पहुंचता है वायरस –


  • ब्लड
  • सीमेन (वीर्य)
  • वैजाइनल फ्लूइड (स्त्रियों के जननांग से निकलने वाला दव)
  • ब्रेस्ट मिल्क
  • शरीर का कोई भी दूसरा फ्लूइड, जिसमें ब्लड हो मसलन, बलगम
  • इनसे भी फैल सकता है एड्स  (इनके संपर्क में अक्सर मेडिकल पेशे से जुड़े लोग ही आते हैं)
  • दिमाग और स्पाइनल कॉर्ड के इर्द-गिर्द रहने वाला दव
  • हड्डी के जोड़ों के आसपास का दव
  • भ्रूण के आसपास का दव
 ये लक्षण हैं तो शक करें –

एचआईवी से ग्रस्त इंसान शुरू में बिल्कुल नॉर्मल और सेहतमंद लगता है। कुछ साल बाद ही इसके लक्षण सामने आते हैं। अगर किसी को नीचे दिए गए लक्षण हैं, तो उसे एचआईवी का टेस्ट कराना चाहिए :


  • एक महीने से ज्यादा समय तक बुखार बने रहना, जिसकी कोई खास वजह भी पता न चले।
  • बिना किसी वजह के लगातार डायरिया बने रहना।
  • लगातार सूखी खांसी।
  • मुंह में सफेद छाले जैसे निशान होना।
  • बिना किसी वजह के लगातार थकान बने रहना और तेजी से वजन गिरना।
  • याददाश्त में कमी, डिप्रेशन आदि।
 (नोट : ये सभी लक्षण किसी साधारण बीमारी में भी हो सकते हैं। )

एचआईवी के लिए मेडिकल टेस्ट –

किसी को एचआईवी इन्फेक्शन है या नहीं, यह पता करने का अकेला तरीका यही है कि उस इंसान का ब्लड टेस्ट किया जाए। लक्षणों के आधार पर शक किया जा सकता है, लेकिन यह पक्के तौर पर नहीं कह सकते कि एचआईवी है या नहीं, क्योंकि एचआईवी के लक्षण किसी दूसरी बीमारी के लक्षण भी हो सकते हैं। कई मामलों में ऐसा भी होता है कि एचआईवी पॉजिटिव होने के बाद कई साल तक कोई लक्षण सामने नहीं आता।

एचआईवी टेस्ट और काउंसलिंग के लिए सरकार ने पूरे देश में 5 हजार इंटिग्रेटेड काउंसलिंग एंड टेस्टिंग सेंटर (आईसीटीसी) बनाए हैं। इन सेंटरों पर व्यक्ति की काउंसलिंग और उसके बाद बाजू से खून लेकर जांच की जाती है। यह जांच फ्री होती है और रिपोर्ट आधे घंटे में मिल जाती है। आमतौर पर सभी जिला अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों और कुछ कम्यूनिटी हेल्थ सेंटरों पर यह सुविधा उपलब्ध है। यहां पूरी जांच के दौरान व्यक्ति की आइडेंटिटी गुप्त रखी जाती है। पहले रैपिड या स्पॉट टेस्ट होता है, लेकिन इस टेस्ट में कई मामलों में गलत रिपोर्ट भी पाई गई हैं। इसलिए स्पॉट टेस्ट में पॉजिटिव आने के बाद व्यक्ति का एलाइजा टेस्ट किया जाता है। एलाइजा टेस्ट में कन्फर्म होने के बाद व्यक्ति को एचआईवी पॉजिटिव होने की रिपोर्ट दे दी जाती है।

एचआईवी कन्फर्म हो जाने के बाद मरीज को इलाज के लिए एआरटी सेंटर पर भेजा जाता है। पूरे देश में ऐसे करीब 280 एआरटी सेंटर हैं। इन सेंटरों पर इलाज शुरू करने से पहले व्यक्ति का एक और ब्लड टेस्ट किया जाता है, जिसमें उसकी सीडी-4 सेल्स की संख्या का पता लगाया जाता है। अगर यह संख्या 250 से कम है तो व्यक्ति का फौरन इलाज शुरू कर दिया जाता है और अगर उससे ज्यादा है तो डॉक्टर उसे कुछ दिन बाद आने की सलाह दे सकते हैं। इन सेंटरों पर भी काउंसिलर भी होते हैं, जो इलाज के साथ-साथ व्यक्ति की काउंसलिंग भी करते हैं। इलाज फ्री होता है और व्यक्ति की पहचान गुप्त रखी जाती है।

ज्यादातर मामलों में एचआईवी इन्फेक्शन हो जाने के दो हफ्ते के बाद टेस्ट कराने पर ही टेस्ट में इन्फेक्शन आ पाता है, उससे पहले नहीं। कई बार इसमें छह महीने भी लग जाते हैं। ऐसे में अगर किसी को लगता है कि उसका कहीं एचआईवी के प्रति एक्सपोजर हुआ है और फौरन टेस्ट कराता है, तो टेस्ट का रिजल्ट नेगटिव भी आ सकता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उस व्यक्ति को इन्फेक्शन नहीं हो सकता। ध्यान रखें कि एचआईवी को शरीर में एक्टिव होने में छह महीने तक लग सकते हैं। इसलिए छह महीने बाद एक बार फिर टेस्ट कराना चाहिए। छह महीने बाद भी अगर नेगेटिव आता है तो आप खुद को सेफ मान सकते हैं। शरीर में वायरस की एंट्री से लेकर उसके एक्टिव होने तक के समय को विंडो पीरियड कहा जाता है। इस पीरियड में एचआईवी का टेस्ट से भी पता भले ही न चलता हो, लेकिन जिसके शरीर में वायरस है वह इसे दूसरे को ट्रांसफर जरूर कर सकता है।


एड्स का इलाज -
एड्स अब लाइलाज नहीं -

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में एक चिकित्सक ने अपने कठिन परिश्रम व लगन से एड्स जैसे लाइलाज बीमारी की आयुर्वेदिक दवा बनायी है जिसका भारत सरकार ने पेटेन्ट कर लिया है।
कुशीनगर के लक्ष्मीगंज के पास वगहा खुर्द निवासी डॉ. संतोष कुमार ने आटोमोवाइल से इंजीनियरिंग करने के बाद आयुर्वेदाचार्य की डिग्री ली और कड़ी मेहनत व लगन से एड्स जैसी लाइलाज बीमारी के लिए लक्ष्मीगंज में अपना अनुसंधान करके विशुद्ध रूप से हानि रहित हर्बल दवा बनायी जिसमें 16 माह में एड्स से निर्मूल रूप से मुक्ति मिल सकती है।

डॉ. पाण्डेय ने पत्रकारों को बताया कि इस दवा के पेटेन्ट के लिए नई दिल्ली स्थित भारत सरकार की पेटेन्ट कार्यालय में छह वर्ष पूर्व आवेदन किया गया था जिसको गहन जांच के बाद 19 जुलाई 2010 को बीस वर्षों के लिए पेटेन्ट कर दिया गया है। इस दवा से एचआई पॉजीटिव रोगी बिलकुल मुक्त हो जाएंगे।


Presented by- Ravi Srivastava.

(मेरी पत्रिका और टोटल हेल्थ केयर में एक साथ प्रकाशित)

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Thursday, November 19, 2009

एसिडिटी को ऐसे भगाएं दूर...


एसिडिटी से आज हर दूसरा आदमी परेशान है। इसकी वजह गलत खान-पान, प्रदूषण, धूम्रपान, शराब का सेवन, चाय, कॉफी और कैफीनयुक्त पदार्थों का ज्यादा इस्तेमाल करना है। एसिडिटी होने पर शरीर की पाचन प्रक्रिया ठीक नहीं रहती।

एसिडिटी के मुख्य लक्षण -

- सीने और छाती में जलन - इससे सीने में दर्द रहता है, मुंह में खट्टा पानी आता है।

- अपचन - इसकी वजह से घबराहट होती है, खट्टी डकारें आती हैं।

- गले में जलन - खट्टी डकारों के साथ गले में जलन-सी महसूस होती है।

- वे लोग जो ज्यादा मिर्च-मसाले वाला भोजन करते हैं, ज्यादा शराब पीते हैं, एसिडिटी का शिकार हो जाते हैं। इसके अलावा और भी कई वजहें हैं जिससे एसिडिटी बढ़ती है।

- वक्त पर भोजन न करना, ज्यादा घी-तेल और मसालेवाला भोजन करना, दिन में भोजन करने के बाद सोना।

- अधिक समय तक तनावग्रस्त रहना, देर तक भूखे रहना।

- जंक फूड बहुत ज्याद खाना, पानी कम पीना।

कैसे करें बचाव -

जरा-सा सावधानी बरतने पर आप एसिडिटी से बचाव कर सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि आप अपने खान-पान में लगातार सुधार लाएं। मूलतः ज्यादा और अयोग्य पदार्थ खाने से पेट में बनने वाले एसिड गले तक पहुंच जाता है। इसी के बाद से शुरु होती है एसिडिटी की शिकायत। लेकिन अगर, खाने में चॉकलेट, शुगर कैंडी, रेड मीट, कॉफी, ज्यादा तली हुई चीजें तथा शराब और सिगरेट के बजाए हरी सब्जियों, मछली और फल को ज्यादा प्राथमिकता दी जाए यो यह शिकायत दूर हो सकती है। साथ ही अगर खाने को एक बार में न खाकर दिन में चार बार थोड़ा थोड़ा करके खाएं और खाने के तुरंत बाद न सोएं तो यह उपाय एसिडिटी को भगाने के लिए बढ़िया रहेगा।

- खाना जरूरत से थोड़ा कम ही खाएं, मिर्च-मसाले और ज्यादा तेलवाले भोजन से बचें।

- भोजन करने के बाद टहलें, रोजाना 8-10 गिलास पानी पिएं।

- समय पर भोजन करें , धूम्रपान, शराब से बचें।

कुछ घरेलू नुस्‍खें -

- आंवला एसिडिटी के उपचार में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाता है।

- अपने रोजमर्रा के आहार में मट्ठा और दही शामिल करें।

- ताजे खीरे का रायता एसिडिटी का बेहतरीन उपचार हैं।

- खूब पानी पिएं, क्योंकि इससे न सिर्फ पाचन में मदद मिलती है; बल्कि शरीर से टॉक्सिन भी बाहर निकल जाते हैं।

- यह सुनिश्चित कर लें कि आप हरी पत्तेदार सब्जियां और अंकुरित अनाज खूब खाएं। ये विटामिन बी और ई का बेहतरीन स्रोत हैं। ये शरीर से एसिडिटी को बाहर निकाल देते हैं।

एसिडिटी
रोग नहीं है। यह जीवनशैली की अव्यवस्था का लक्षण है। आप अगर अपने आहार में जरा-सा बदलाव लाएं, तो एसिडिटी से बचा जा सकता है।
सधन्यवाद- जोश १८